Health tips

स्वास्थ्य से सम्बंधित नियमों का पालन तथा किसी भी काम में अति न करना प्राकृतिक चिकित्सा का मुख्य सिद्धांत होता है। कहने को तो यह बहुत ही साधारण सी बात लगती है। परन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। प्रकृति के नियमों को तोड़ने से बीमारियां पैदा होती हैं जबकि प्रकृति के नियमों का पालन करने से हमारे स्वास्थ्य की रक्षा होती है। प्रकृति के नियमों का पालन करने के लिए आवश्यक होता है कि हमें प्राकृतिक चिकित्सा के महत्वपूर्ण सिद्धांतों के बारे में जानकारी हो जो निम्नलिखित है- किसी भी रोगों से छुटकारा पाने की शक्ति हमारे शरीर के अंदर ही उपस्थिति होती है। बशर्ते उसका सही तरह से उपयोग किया जा सके। शरीर का बीमारियों से ग्रस्त होने का प्रमुख कारण रक्त का दूषित होना होता है। रोगी के शरीर और मन दोनों का उपचार एक साथ ही करना चाहिए। बिना सफाई के चिकित्सा नहीं हो पाती है। रोगी को अपना उपचार स्वयं करना चाहिए क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है। रोगी के रोग से ठीक होने की आंतरिक शक्ति : प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति हमेशा स्वस्थ रहता है। हमारे शरीर की प्राणशक्ति के प्रवाह से हमारा जीवन पृथ्वी पर व्याप्त वातावरण के अनुसार ढल जाता है। यह प्राणशक्ति मानव शरीर और वातावरण में लय उत्पन्न करती है। यदि हमारे शरीर की जीवनी शक्ति अपने आपको वातावरण के अनुरूप नहीं ढाल पाती, या गलत ढंग से ढालती है, तो शरीर अस्वस्थ होकर किसी रोग से ग्रस्त हो जाता है। शरीर को प्रकृति के नियमों के अनुरूप चलाने के लिए एक निश्चित मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। किसी भी दवा का सेवन करने से यह ऊर्जा नहीं आती है। स्वरक्षित प्राणशक्ति ही सभी रोगों से हमारे शरीर की रक्षा करती है। शरीर के अंगों तथा सेलों की स्वरक्षित शक्ति शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देती है। संरक्षक सेल (कोशिका) : कभी-कभी किसी लड़के को चोट आदि लग जाने पर तथा घाव आदि हो जाने पर वह दवा का सेवन करने से इंकार कर देता है तथा घाव का उपचार भी नहीं करता है। आश्चर्य की बात है कि कुछ ही दिनों में उसका घाव भी ठीक हो जाता है। ऐसा होने का भी कारण होता है जब बच्चे के शरीर में कहीं पर चोट लगती है तो रक्त में विद्यमान छोटे-छोटे सेल पूरी शक्ति के साथ काम करते हैं। कच्चे घाव के पास में सेल्स अपेक्षाकृत बहुत तेजी से बढ़ते हैं तथा धीरे-धीरे नई त्वचा से घाव भर जाता है। इन सेल्स (कोशिकाओं) को पुलिस सेल्स कहा जाता है। जब तक घाव भर नहीं जाता है यह त्वचा का संक्रमण होने से बचाते हैं। गम्भीर चोट लगने पर जब शरीर की मांसपेशियां क्षत-विक्षत हो जाती हैं तो अंदर के तंतुओं में घाव को भरने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। हड्डी टूटने के कुछ समय बाद स्वयं ही कोमल तंतुओं से जुड़ जाती है। इन तंतुओं की परिपक्तवा के लिए शरीर में मौजूद खनिज पदार्थ उपयोगी साबित होते हैं। रीढ़ की हड्डी तथा दिमाग के नाड़ी तंतुओं को छोड़कर शरीर के किसी भी भाग के तंतु चोट लगने पर नई त्वचा बनाने की क्षमता रखते हैं। प्राणशक्ति- एक आश्चर्य प्राय: ऐसा देखने और सुनने में आता है कि सुदूरवर्ती स्थानों या गांवों में, जहां अन्य कोई चिकित्सीय सहायता उपलब्ध नहीं होती है, वहां के लोग गम्भीर बीमारियों से ग्रस्त होने और दुर्घटना होने पर भी ठीक हो जाते हैं। इस प्रकार की घटनाओं में प्रकृति द्वारा प्रदान की गई प्राण-शक्ति ठीक होने की प्रक्रिया में अपना काम करती है। इन विषम परिस्थितियों में से गुजरने वाला व्यक्ति रोगों से मुक्त होने के बाद अधिक कमजोरी का अनुभव करता है लेकिन चूंकि प्रकृति के द्वारा उसकी चिकित्सा हुई होती है इस कारण से उसको कोई भी गम्भीर रोग होने की आशंका नहीं होती है। प्राकृतिक रूप से ठीक होने की प्रक्रिया में दवाओं के उपयोग से विभिन्न प्रकार के विकार उत्पन्न हो सकते हैं। शरीर की जीवनी शक्ति का कमजोर होना : प्राकृतिक उपचार के दौरान भी कुछ व्यक्तियों की मृत्यु हो सकती है। यह अन्तर प्राण-शक्ति की अधिकता या कमी के कारण होता है। इसे इस तरीके से समझा जा सकता है कि कुछ व्यक्ति गम्भीर रूप से घायल होने पर तथा कैंसर जैसी असाध्य बीमारी से पीड़ित होने के बावजूद ठीक हो जाते हैं जबकि दूसरे लोग मर जाते हैं। प्रकृति के अनुसार जीवनयापन न करने से प्राण-शक्ति कम होती जाती है। इस कारण व्यक्ति धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है। संक्रमण के प्रभाव के कारण रोगी की शारीरिक शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है और वह विभिन्न रोगों से ग्रस्त हो जाता है। जब तक रोगी का शरीर और आत्मा दोनों एक समान रूप में होते हैं तभी तक रोगी की प्राणशक्ति ठीक रहती है। यदि हम प्राकृतिक नियमों के अनुसार अपना जीवन यापन करना छोड़ देते हैं तो हमें विभिन्न शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस दौरान रोगी के शरीर की प्राण-शक्ति रोगी को फिर से स्वस्थ करने का प्रयास करती है। तब जो विषैले द्रव्य शरीर में एकत्र हुए हैं, वे दर्द और फफोलों के रूप में बाहर निकलते हैं। यह शरीर में विजातीय द्रव्यों को रहने नहीं देती है। इससे शरीर में बीमारी होने के सभी कारण नष्ट हो जाते हैं। इन लक्षणों को प्राकृतिक चिकित्सा में हीलिंग क्राइसिस नाम से जाना जाता है। बीमारियों का प्रमुख कारण रक्त का विषैला होना : शरीर के दूषित पदार्थों को निकालने वाले प्रमुख अवयव निम्नलिखित हैं- फेफडे़ : फेफड़े श्वास के द्वारा शरीर से कार्बन डाईआक्साइड को बाहर निकालते हैं। गुर्दे : गुर्दे मूत्र और नमक को शरीर से बाहर निकालते हैं। आंते : खाना पचने के बाद जो अवशिष्ट शेष बचा रह जाता है, आंते उसे मल के साथ पेट से बाहर निकाल देती हैं। त्वचा : त्वचा पसीने की सहायता से शरीर के दूषित तत्वों को शरीर से बाहर निकाल देती है। यदि उपर्युक्त अंगों पर जरूरत से अधिक भार पड़ता है, तो नसों में रुकावट आ जाती है जिससे खून का बहाव ठीक प्रकार से नहीं हो पाता है जिसके कारण खून में विषैले पदार्थ मिल जाते हैं। अधिक मात्रा में किया गया ऐसा भोजन, जिसकी गुणवत्ता में कमी हो, साथ में व्यायाम का भी अभाव नसों में रुकावट पैदा करता है। इसके परिणामस्वरूप श्वास प्रक्रिया सम्बंधी अवयवों, जैसे नाक और गले में सूजन हो जाती है, त्वचा शुष्क हो जाती है तथा बहुत अधिक तैलीय हो जाती है, लीवर में भी सूजन उत्पन्न होने से उसमें वृद्धि हो जाती है, आंतों में कब्ज हो जाता है और शरीर के अवशिष्ट पदार्थ के विषैले तत्व खून के प्रवाह में मिल जाते हैं। इस स्थिति में ऑक्सीजन द्वारा बिगड़ी हुई प्रणाली को सुधारने के लिए व्यायाम की आवश्यकता होती है। रोगी के शरीर और मन की चिकित्सा एक साथ करना: हमारे शरीर और मन की इकाई को वातावरण के अनुकूल होना चाहिए। किसी भी तरह के हानिकारक तत्व बिना मन को प्रभावित किये हुए शरीर में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। हमारे भाव शारीरिक क्रियाकलापों को प्रभावित करते हैं। किसी भी व्यक्ति का मानसिक व्यवहार यह तय करता है कि उसका शरीर किसी बीमारी से कितना प्रभावित हो सकता है। अधिकतर अधिक समय तक चलने वाली बीमारियों का निश्चित रूप से भावनाओं से भी सम्बंध होता है। साधारण सर्दी, जुकाम, पेट का दर्द और सिर का दर्द भी भावनाओं से सम्बन्धित होता है। मानसिक तनाव, चिंता, डर, ईर्ष्या और नफरत हमारे शरीर को प्रभावित करते हैं तथा शरीर के रक्त को विषैला बनाते हैं। हमारे शरीर के रक्त के विषैला होने से शरीर में विभिन्न प्रकार के घातक रोग उत्पन्न होते हैं। शरीर का साफ-सुथरा होना : प्रत्येक व्यक्ति अपने बाहरी अंगों की अच्छी प्रकार से सफाई करता है। हाथ या पैर में थोड़ी सी भी धूल या मिट्टी लग जाने से हम उसे तुरन्त साफ करते हैं। इसी प्रकार से आंतरिक अंगों जैसे पाचनतंत्र आदि के सफाई की भी आवश्यकता होती है। यदि आंतरिक अंगों को देख पाना सम्भव होता तो हमें आंतरिक अंगों की सफाई के बारे में महसूस होता है। हमारे शरीर के आंतरिक अंगों में भी दिमाग होता है। शरीर की अस्वास्थ्यकर भावनाएं तथा विचार हमारे दिमाग को इतना अधिक प्रभावित करते हैं कि हार्मोन्स का संतुलन बिगड़ जाता है और शरीर का रक्त संचार प्रभावित हो जाता है। शरीर के आंतरिक अंगों की सफाई करना : जिस प्रकार से हम किसी भी मशीन को साफ करने के लिए उसके सभी पुर्जों को खोलते हैं तथा उसके एक-एक हिस्से को साफ करते हैं। उसी प्रकार से हमारा शरीर भी एक जटिल मशीन के समान होता है लेकिन अंग अलग नहीं किये जा सकते हैं, फिर भी शरीर की आंतरिक सफाई बहुत आसान है क्योंकि हमारे शरीर की सफाई जल के अधिक सेवन करने और विश्राम करने से हो जाती है। शरीर की आंतरिक सफाई के लिए उपवास और जल का प्रयोग : उपवास हमारे दैनिक जीवन के लिए बहुत अधिक लाभकारी होता है। हम उपवास रखकर केवल जल पीकर शरीर की सफाई कर सकते हैं। हमारे शरीर में लगभग 70 प्रतिशत द्रव्य होता है, जिसमें रक्त, मूत्र, जल तथा पित्त आदि शामिल होते हैं। हमारे शरीर में रक्त के संचरण की प्रक्रिया चलती रहती है। इस प्रक्रिया में रक्त में विभिन्न प्रकार के विषैले पदार्थ जमा हो जाते हैं जिसे शरीर से बाहर निकालना अधिक आवश्यक होता है। यदि उनको न निकाला जाए तो, वे शरीर में बीमारी उत्पन्न करते हैं। उपवास करने से शरीर के पाचनतंत्र को बहुत ही विश्राम मिलता है तथा जो अवशेष भोजन पचने के बाद शरीर में बचे रह जाते हैं, विश्राम उनको बाहर निकालने में मदद करता है। पाचनतंत्र को ठीक करने का यह सबसे अधिक वैज्ञानिक तरीका है। जब हम उपवास रखते हैं तो हमें बार-बार पेशाब करने के लिए बाहर जाना पड़ता है। शरीर के आंतरिक अंगों की थकी हुई मांसपेशियों और तंतुओं को ठीक करने के लिए उपवास के दौरान जल और द्रव्य पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन करने से शरीर में विद्यमान विषैले पदार्थ अधिक मात्रा में शरीर से बाहर निकलते हैं। उपवास के दौरान सांस से दुर्गंध आती है। ऐसा होने का कारण यह है कि शरीर में एकत्रित गंदी गैसों को उपवास के दौरान ही बाहर निकलने का मौका मिलता है। सभी धर्मों में एक सप्ताह या पन्द्रह दिन के अंदर एक बार उपवास करने का नियम है। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर की सफाई करना होता है। उपवास रखकर शरीर की सफाई करनी चाहिए तथा ध्यान करके और प्रार्थना करके मन की सफाई करनी चाहिए। वर्तमान समय की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में सफाई के ये तरीके बहुत कठिन दिखाई पड़ते हैं, लेकिन इनसे होने वाले लाभों के मद्देनज़र इन्हें कभी-कभी थोडे़ से समय के लिए अपनाया जा सकता है। अधिकांश लोगों को यह बात हजम नहीं होगी किन्तु यह सच्चाई है कि एक व्यक्ति बिना भोजन किये हुए महीनों तक जीवित रह सकता है। जिस किसी भी व्यक्ति ने उपवास रखा हो वहीं उपवास के महत्व को समझ सकता है। ऐसा अनुभव उन लोगों को होता है जो थोड़ा सा बीमार होने या अत्यधिक थकान होने के कारण एक दिन भोजन नहीं करते हैं। ऐसी स्थिति में ताजा पानी, फलों का रस और गर्म दूध पीने से लाभ मिलता है। यदि किसी को भूख न लग रही हो तो इसका तात्पर्य यह होता है कि हमारे पाचनसंस्थान को आराम करने की आवश्यकता है। ऐसा होने पर हमें अधिक से अधिक तरल पदार्थों का सेवन करना चाहिए। यदि हम भूख न लगने के बावजूद भी भोजन करते हैं तो इससे हमारे शरीर की थकान अधिक बढ़ जाती है जिसके कारण बहुत अधिक नींद आती है। लेकिन इससे हमारा स्वास्थ्य खराब हो जाता है। उपवास रखने और अधिक तरल पदार्थों का सेवन करने से शरीर के दूषित तत्व शरीर से बाहर निकल जाते हैं। लेकिन आंतों की संरचना इस प्रकार की होती है कि उसकी ठीक प्रकार से पूरी सफाई नहीं हो पाती है। इसके लिए एनिमा लेने की आवश्यकता होती है। जब शरीर इन दोनों पद्धतियों (उपवास और अधिक तरल पदार्थों का सेवन) से दूषित तत्वों से मुक्त हो जाता है, तब कैंसर जैसी असाध्य बीमारियां भी ठीक हो जाती हैं। ऐसे बहुत से रोगी हैं जिनकी असाध्य बीमारियां उपवास, एनिमा, ताजे जल तथा फलों के रस को सेवन करने से दूर हो जाती हैं। उपवास और भूखे रहना : उपवास और भूखा रहने में अन्तर होता है। हम प्रतिदिन जो भोजन ग्रहण करते हैं, वह पूरी तरह से पच नहीं पाता है। इसका कुछ हिस्सा लीवर में तथा मांसपेशियों के तंतुओं में इकट्ठा हो जाता है। इस भोजन को जब तक प्रयोग में नहीं लाया जाता है तब तक यह एकत्र होता रहता है। जब कभी हम उपवास रखते हैं तो उस दौरान हमारा शरीर अपना भोजन इसी संचित कोष से लेता है। जब एकत्र हुआ भोजन समाप्त हो जाता है तो शरीर अपनी मांसपेशियों के तंतुओं पर भोजन के लिए निर्भर होता है। यह अवस्था भूखा रहने की होती है। यदि हम चाहे तो उपवास रखकर किसी भी बीमारी को दूर कर सकते हैं।